एकल माँ

एकल माँ
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माँ एकल
थी विकल
कैसे वह सम्हाले !
बेल वंश
प्रणय परिणिति
हृद अंश

बाहर झन्झा
आलोड़ित अन्तर
किस संबल,
तम का —
प्रतिकार करे
क्यूँकर विकट
विघ्न हरे

जब हो
सुधड परिधान में
भेड़िया अंतर्ध्यान
प्रछन्न रहता खंजर
इनके म्यान
भांप मेमने की आँत
लगा लेता है वह
चुपके से घात
मुस्कान का मृदु पाश फेंक
तत्परता से लेते
अपनी रोटी सेंक
नर्म गर्म गोश्त की
जब हो चाह
क्यूँकर करे कोई
नैतिकता की परवाह

ऐसे ही न जाने
कितनी परिस्थितियाँ विकट
होना पड़ता है दो चार
आते ही रहते हैं सन्निकट
परीक्षा की जब होती पराकाष्ठा
तपकर निखर उठती
ये माँएँ
विजयी होती इनकी निष्ठा
— विधु भूषण मंडल

एकल माँ

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