सुसाइड और डिप्रेसिव सुसाइड के बीच के फ़र्क को समझें-रश्मि शाक्य

सुसाइड और डिप्रेसिव सुसाइड के बीच के फ़र्क को समझें

-रश्मि शाक्य

कल सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड की ख़बर ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। भारत में इसके बढ़ते आंकड़े बहुत डराने वाले हैं। लेकिन डिप्रेसिव सुसाइड को अन्य सुसाइड मामले से अलग करके समझने और जांचने की आवश्यकता है। डिप्रेशन गहरी निराशा और उदासी की एक ऐसी मानसिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति के भीतर भावनात्मक ख़ालीपन गहराई तक पांव फैला लेता है। भीड़ में भी वह ख़ुद को बहुत अकेला महसूस करता है। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस (निम्हंस) ने 2016 में भारत के 12 राज्यों के सर्वेक्षण में डिप्रेशन के गंभीर और चिंताजनक आंकड़े पाए। जिसके मुताबिक़ आबादी का 2.7 फ़ीसद हिस्सा डिप्रेशन जैसे कॉमन मेंटल डिसऑर्डर का शिकार है। जबकि 5.2% आबादी कभी न कभी इस समस्या से ग्रसित हुई है। इस सर्वेक्षण से यह भी अंदाज़ा लगाया गया, कि 15 करोड़ भारतीयों को किसी न किसी मानसिक समस्या की वजह से तत्काल मानसिक चिकित्सकों की जरूरत है।

http://<iframe width=”683″ height=”384″ src=”https://www.youtube.com/embed/S2U2TqRxrpo” frameborder=”0″ allow=”accelerometer; autoplay; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture” allowfullscreen></iframe> वर्तमान हालात में कॉमन मेंटल डिसऑर्डर से लगभग 30-40 फ़ीसदी लोग प्रभावित हैं। इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। जैसे- किसी काम में मन न लगना, शरीर में कोई बीमारी न होने के बावजूद थका-थका महसूस करना, भरपूर नींद ना आना, चिड़चिड़ापन, ग़ुस्सा, अस्त-व्यस्त जीवनशैली आदि। इन आधार पर अगर देखा जाए तो देश में इस समय कम से कम 25-30 हजार तक मानसिक स्वास्थ्य के चिकित्सकों की जरूरत है।


सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात है- डिप्रेशन का स्तर समझना। सामान्य अवसाद और गहरा अवसाद दोनों के उत्पन्न होने की परिस्थितियां भले एक हो सकती हैं, लेकिन स्तर भिन्न होता है। बिना इसकी गंभीरता को ठीक से समझे न तो हम इसका सही इलाज कर सकते हैं, न ही व्यक्ति की संवेदनात्मक मदद कर सकते हैं।

https://youtu.be/S2U2TqRxrpo


जीवन अपने आप में धरती पर सृष्टि द्वारा उकेरा गया सबसे सुन्दर चित्र है। जब कोई जीव धरती पर जन्म लेता हैब,उसी वक़्त सृष्टि उसके भीतर अस्तित्व की जिजीविषा का अद्भुत बीज बो देती है। उसकी रक्षा के लिए एक तरफ़ जहां धरती के अन्य जीवों को पैने दांत, पंजे, डंक, विष आदि मिले हैं, वहीं मनुष्य को मस्तिष्क। जिसकी बदौलत तकनीकी, विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा हर क्षेत्र में मनुष्य ने स्वयं को स्थापित किया है। समुद्र की गहराई से लेकर आकाश तक उसके क़दम पहुंचे हैं। इन सबके बीच जो एक तत्व निहित है, वह है -अस्तित्व और जिजीविषा। जिसे उसने धरती के समस्त जीव धारियों से अधिक सिद्ध किया है। जन्म से ही एक मनुष्य स्वयं को अपने जीवन के केंद्र में रखता है। द्वितीय स्तर पर संभवतः अपनी मां को। जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ती है, दूसरे-तीसरे या अन्य स्तर पर वह संबंधों की संख्या और व्यक्ति का स्थान बदलता रहता है। लेकिन जीवन के केंद्र में हमेशा वह स्वयं रखता है।
गहरे अवसाद का सबसे बुरा लक्षण यही है, कि वह अपने जीवन के केंद्र से स्वयं को अलग कर लेता है। उसकी जगह पर कोई विशेष परिस्थिति या कोई व्यक्ति विशेष हो जाता है, जिसकी वजह से वह डिप्रेशन में चला जाता है। यही गहरे अवसाद की चरम अवस्था कही जा सकती है। इस अवस्था में वह स्वयं को पूरी तरह अलग-थलग महसूस करता है। उसके भीतर स्वयं से प्रेम का स्तर दिन-ब-दिन घटकर शून्य की तरफ बढ़ने लगता है। ऐसी परिस्थितियां उस व्यक्ति के लिए अधिक घातक होती हैं, जो किसी क्षेत्र में एक सेलिब्रिटी के रूप में स्थापित होता है। काम के दबाव, अपनी सामाजिक छवि और इस मानसिक अवस्था के भीतर वह लगातार जंग लड़ रहा होता है। उसे उम्मीद भी होती है कि एक न एक दिन वह ज़रूर सब कुछ ठीक कर लेगा। लेकिन कभी-कभी उसका धैर्य और साहस जवाब दे जाता है और वह स्वयं को समाप्त कर लेता है। इस तरह बाक़ी सुसाइड से ‘डिप्रेसिव सुसाइड’ बिल्कुल अलग है। सुसाइड अधिकांश त्वरित निर्णय होता है, लेकिन कम से कम डिप्रेशन के मामले में तो हम यह बात नहीं कर सकते हैं।
सुशांत सिंह के मामले में कुछ क़रीबियों को यह बात पहले से ही पता थी, कि वे लगभग 6 महीने से डिप्रेशन में थे। लेकिन जैसा प्रोफेशनली एक्टिव या बड़े सामाजिक छवि के लोग अपनी उदासी को जगजाहिर नहीं कर पाते। अपने मन के भीतर की दरकी दीवार को छिपाने के लिए इस तरह हंसते-मुस्कुराते हैं , जैसे कि सब कुछ ठीक है। उनके मामले में भी वही हुआ। रही बात अपनों की, तो उन्हें लगता है कि स्वतः ही धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। कभी-कभी तो वे अपनी स्थिति बताने पर हँस भी देते हैं, कि इसके पास दौलत-शोहरत और सफ़लता सब कुछ तो है। फ़िर इसे किस बात का दुःख। इसकी गंभीरता लोग नहीं समझ पाते। कम से कम हमारे देश में तो डिप्रेशन में जाने वाले को ही मूर्ख समझा जाता है। इसको लेकर जिस तरह का यह सामाजिक नज़रिया है, वह काफ़ी दुखद है। वे अपने ही घर के व्यक्ति की इस बड़ी समस्या को हल्के में लेते हैं। शारीरिक बीमारियों की जटिलता या भयावहता तो समझते हैं, लेकिन मानसिक परिस्थितियों की नहीं। जबकि शरीर की सारी क्रियाओं या रोग का आरम्भ-बिन्दु मन-मस्तिष्क ही हैं। तो ज़रूरी है इस विषय पर शोध की, सार्थक बहस की और समाधान के उचित प्रयास की। साथ ही
अपने आस-पास और आत्मीय लोगों की आंखों में झांक कर देखने की, कि वह किस मानसिक अवस्था में है। सही चिकित्सा और हमारी आत्मीय संवेदना ही इसका प्रथम और आख़िरी इलाज है।

-रश्मि शाक्य

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