“बोनसाई बना मानव”

“बोनसाई बना मानव”

विस्तार में बंधी हरी भरी बोनसाई,
आज के मानव की सच्चाई,
गमले की परिधि सी धरती,
एक कमरे सा आसमान ,
जड़ बौनी सिसकता आकर्षण,
संकुचित हो गया वितान ,
आकांक्षा के तारों में कसा हुआ,
पीड़ा से खुद को सजा रहा ,
झूठे सौंदर्य की छांव तले ,
स्वच्छंद परिंदों को बुला रहा,
फल फूल पत्तियां सजा तना,
पर कितना है सूना सूना ,
निकृष्ट स्वार्थी बन मानव ,
ये कैसा ? तूने संसार बुना,
किया अनुकरण पर संस्कृति का,
स्वाभाविकता से दूर हुआ,
बन बोनसाई संकुचित कर खुद को,
आकर्षण में चूर हुआ,
यह कला सिर्फ तुझ में ही है ,
तू घटा- बढ़ा सकता है कद ,
पर तुझको ही ले डूबेगा ,
एक दिन तेरा ये झूठा मद।
डॉ ज्योत्सना सिंह लखनऊ

mediapanchayat

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