देह से गुज़ार लो…

देह से गुज़ार लो…


ना जाने कितनी योनियों से भटकतीहुई आई इस देह में,और तुम्हारी रूह का मुझमेंबलात घुस जाना,देह ही निरर्थक हो गई,मैं बस रूह की समर्थकहो गई,
मगर ठंडा-गरम तो लगताहै देह पर,चढाती फूल पर मैं आत्माश्रद्धेय पर,तुम्हारी कौनसी पुकार जानेकाम ऐसा कर गई,प्रेम पात्र रह गया और वासनाही मर गई,
हुंकार रूह भर रही हैरूह का संभोग दो,देह छोड देह को निर्वासनाका योग दो,त्रिशूल प्रेम का हिय के पारमें उतार दो,जनम जनम से बिखरे केशहाथों से सँवार दो,
निर्लज्जता की हद तलकमैं रूह का लिबासउतार दूँ,मैं बेबदन हो करकेतुझपे मात्र प्राणत्याग दूँ,बस तुम तपस्या को मेरीकरना कलंकितना कहीं,सुप्त वासना के नागों कोकरना अलंकृतना कहीं,
मैं देखना के साँस उसीक्षण ना त्याग दूँ कहीं,अलौकिक प्रेम कीपराकाष्ठा कीदास्ताँ रह जाए नाकहीं अनकही,इस वास्ते तुम देह कुछेकदेह से गुज़ार लो,मुझको गले की फाँस साबस रूह में उतार लो,

Soniya Khurania

mediapanchayat

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