चक्रवाती तूफान” अम्फान”-रिंकी झा

चक्रवाती तूफान” अम्फान”


सुनो, अब लौट आओ ना गाँव
की शहर रहने लायक नहीं रहा/

कभी भूकंप, कभी बाढ
कभी बीमारी, कभी तूफान
ये कैसी परीक्षा है ?
आखिर कितना सहन करें इंसान?
परिवार की खुशी के लिए ही लोग जाते हैं ना परिवार से दूर , ताकि ला सके कुछ उपहार, कुछ कपड़े, कुछ पैसे/

अकसर अपनों के लिए
अपनों से दूर होकर कहनेवाले–
हम दुर्गा पूजा में आएंगे ना
बहुत सारी खुशियाँ लेकर/
जब कहें-
कैसे आ पाऊँगा मैं गाँव?
बंद है सब यातायात/
सुनकर परिजनों के आँखों में समुद्र उमड़ पड़ते है/

जब बाहर फँसे बच्चे कहे
आज मोटर में पानी नहीं है/
चारों तरफ बाढ सा पानी भर गया है
पर पीने के लिए पानी ही नहीं है/
गाँव में बैठे परिजन
कुछ नहीं कर पाते हैं बाहर फँसें अपने बच्चों के लिए/
इस बात की सजा
खुद को देने के लिए
वो गाँव में पानी रहते हुए भी
आँसूं पीकर रहते हैं/

माता-पिता, संतान सब एक-दूसरे से दूर क्यों होते हैं?
काश, होते सब एक जगह/
अच्छे कपड़े और अच्छी जिंदगी ना सही
कम से कम साँस तो संग ले पाते/

हवाएँ तोड़ रही हैं इमारतों को/
टूट रहें हैं लोग/
उजड़ रही है बस्तियाँ/
बिखर रहें हैं सपनें/
कौन रोकें इस तूफ़ान को?
है किसमें इतनी हिम्मत?
महादेव !अब आप ही रक्षा करिये/

रिंकी झा
मधुबनी (बिहार)
21/05/2020

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