चका चौंध -अवनीश पांडेय

नित नवीन इस चका चौंध में
कुछ तो हमने खोई है,
जो आज मानवता अपने ज़द में
फूट फूट के रोई है।

बरपा सन्नाटा सड़कों पर,
खुद ही कैद हुए है आज,
लाशें गीन गीन उंगली रोती
भूल गया है सारा साज।
काट रहे हैं आज, आज तक
जो कुछ हमने बोई है
आज मानवता अपने जद में ..

हमने अपना ज्ञान, धरणीधर
के माथे तक बांचा है,
ध्वस्त पड़ा है ज्ञान आज,
विपदा ने केवल जांचा है।
धरा पड़ा है ज्ञान, ज्ञान की
सारी विधियां सोई हैं
आज मानवता अपने जद में..

                         ✍️ अवनीश पांडेय

mediapanchayat

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Next Post

आँखें-अनुश्री

Sat May 23 , 2020
कभी आशकार हों आँखेंइश्क़ का इश्तिहार हों आँखें मुद्दतों बाद उसको देखा हैक्यूँ न फिर अश्क़बार हों आँखें, सबकी आँखों के ख़्वाब बुन पायेंकाश वो दस्तकार हों आँखें.. तेरी आमद पे खिल ही जाती हैं,कितनी भी सोगवार हों आँखें, डूब कर इश्क़ में जो मर जायें,फिर मेरी शाहकार हों आँखें..!!अनुश्री!!

Breaking News