नजरिया- रश्मि शाक्य

सवाल-  हिंदी साहित्य की शीर्ष युवा कवयित्रियों में राष्ट्रीय स्तर पर आपका नाम बड़े आदर के साथ आजकल लिया जा रहा है। अपने प्रारंभिक जीवन के विषय में कुछ जानकारी हमारे पाठकों को दीजिए।

जवाब – मेरा जन्म ग़ाज़ीपुर उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में हुआ। मेरी प्रारंभिक शिक्षा वहीं से संपन्न हुई। कक्षा पांच में मैं जवाहर नवोदय विद्यालय की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर आगे की पढ़ाई के लिए विद्यालय के हॉस्टल पहुंची। बचपन से ही मैं काफ़ी अंतर्मुखी थी। विद्यालय की असेंबली में किसी न किसी रूप में कुछ भी कहने के लिए ज़बरदस्ती मेरी ड्यूटी लगाई जाती। कभी-कभी तो बिना कुछ बोले ही देर तक खड़ी रहती। मुझे इस तरह टीचर्स का असेंबली में खड़ा करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। क्लास में सबसे पीछे बैठना (यह आदत आज तक पसंद है) मुझे पसंद था, लेकिन ज़बरन सबसे आगे बैठा दी जाती थी। क्लास ख़त्म होने के बाद घंटों वहां अकेले बैठे रहना अच्छा लगता था। अकेलापन शुरू से ही मेरे जीवन का अटूट हिस्सा रहा। इन्हीं पलों में कुछ तुकबंदी  करती या कुछ लिखती। सीनियर्स और टीचर्स मुझे प्रेरित करते (लेकिन मज़ाल क्या कि मैं मुस्करा भी दूं)। वहां मन नहीं लगा। पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर नवीं कक्षा के बाद मऊ अपने मामा के घर चली गयी। वहीं से मैंने दसवीं की परीक्षा पास की। मैं कभी भी किसी एक विद्यालय या कॉलेज में लंबे समय तक नहीं पढ़ पाई। क्योंकि वहां से मेरा मन बहुत जल्द उचट जाता था। इस दौरान लगातार कविताएं लिखना-पढ़ना ज़ारी रहा। मैं डीसीएसके पी0जी0 कॉलेज मऊ से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही थी। उसी दौरान पहली बार किसी साहित्यिक मंच पर अपनी रचना पढ़ी। वह 15 अगस्त का दिन था। वैसे उस समय जनपद में दो-तीन मंच से जुड़ी कवयित्रियाँ थीं। लेकिन सब जनपद के बाहर के कार्यक्रमों में व्यस्त थीं। और इस तरह मेरा मंचों पर पदार्पण हुआ। दरअसल, मैंने किसी मंच पर कविता पढ़ने के विषय में कभी नहीं सोचा था। ये सब अचानक हुआ। और इस तरह मैं धीरे-धीरे पूर्वांचल, प्रदेश से लेकर देश के तमाम मंचों पर कविता पाठ के लिए गई। चूंकि मंच को लेकर उतनी आसक्ति नहीं रही,  इसलिए कभी किसी बड़े कवि (मंचीय) से मुझे इसके लिए निवेदन नहीं करना पड़ा। आज तक मैंने सिर्फ़ अपनी शर्तों पर मंचों का यहां तक का सफ़र तय किया है। क्योंकि मंच या प्रसिद्धि मेरी प्राथमिकता कभी नहीं रहे। मेरी प्राथमिकता सिर्फ़ मेरी रचनाधर्मिता ही रही।

सवाल- कवि सम्मेलन के मंच पर जाना जब आप ने शुरू किया, तो शुरुआती दौर में किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ा?

जवाब- दरअसल, यह कटु सत्य है कि मंच पर कविता पाठ करने वाली कवयित्री भी तो एक स्त्री ही होती है। घर के बाहर निकलने वाली प्रत्येक स्त्री को जिन तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, वे सभी मेरे समक्ष थीं। ऊपर से कवि सम्मेलन का क्षेत्र तब तक पूरी तरह से ग्लैमर की फील्ड में तब्दील हो चुका था। ग्लैमर की दुनिया के अपने फ़ायदे-नुकसान होते हैं। उसमें अपने व्यक्तित्व को गढ़ना-रचना बहुत मुश्किल होता है और आसान भी। रातों-रात स्टार बनने के सपने पाले लोग यहां भी आते हैं। इस स्टारडम में अपने बनते-बिगड़ते व्यक्तित्व के साथ कितनी लंबी यात्रा  कर पाते हैं, यह पूरी तरह से उनकी क्षमता पर निर्भर होता है। कभी-कभी तो स्वयं पर किया गया विश्वास भी डगमगा जाता है। मंचीय रचनाकारों की रचनाधर्मिता (ख़ास तौर से कवयित्रियों) पर हमेशा प्रश्नचिन्ह लगते रहे हैं। ऐसे में ख़ुद को साबित करना मेरे लिए काफ़ी मुश्किल था। ऊपर से न तो मेरे अंदर दूसरों की ख़ुशामद करने वाला गुण था, न ही दूसरों की शर्तों पर चलना आता था। तो इसलिए मेरे समक्ष इसके तरह-तरह की दुष्परिणाम आए। उनमें से एक था – बड़े-बड़े महोत्सव या अन्य बड़े कवि सम्मेलनों में से मेरा नाम कट जाना।

सवाल- आप बहुत पिछड़े ज़िले से हैं। लेकिन आज आपकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर एक समर्थ कवयित्री के रूप में है। आपको अब तक का यह सफ़र कैसा लगा?

जवाब- मेरा ज़िला थोड़ा पिछड़ा ज़रूर है। लेकिन इसने देश को बड़े-बड़े रचनाकार दिए हैं। आधा-गांव जैसे चर्चित उपन्यास और महाभारत की पटकथा के लेखक राही मासूम रज़ा, ललित निबंध के जनक कुबेरनाथ राय, मनबोध मास्टर की डायरी,फिर बैतलवा डाल पर जैसे निबंधों और सोना-माटी जैसे उपन्यास के लेखक डॉ विवेकी राय और बड़े मार्क्सवादी चिंतक-आलोचक डॉ पी0एन0 सिंह इसी मिट्टी में जन्मे।

 लेखन से लेकर मंचीय स्तर तक इस छोटे जनपद से अखिल भारतीय स्तर पर अपनी पहचान बनाना मेरे लिए काफ़ी मुश्किल था। क्योंकि एक तो मेरा स्वभाव इसमें आड़े आता था। दूसरा मेरा कोई गॉडफादर नहीं था। आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं, तो मुझे बहुत संतोष होता है।

सवाल- आपकी प्रेम पर लिखी कविताओं में समर्पण और भावुकता चरम पर होती है, वहीं जब विसंगतियों पर आपकी लेखनी चलती है तो उसमें काफ़ी प्रखरता होती है। आपके दोनों रूप बहुत भिन्न होते हैं एक दूसरे से।

जवाब- प्रेम बहुत कोमल संवेग है। उस पर लिखना और उसे जीना दोनों ही हमारे हृदय का सबसे ख़ूबसूरत और नाज़ुक एहसास है। जो प्रेम को इस हद तक नहीं महसूस कर सकता, वो विसगतियों को भी उस शिद्दत से नहीं महसूस कर सकता।

सवाल- आप की पहली ही कृति “गीतों की वीथिका में’ के लिए आपको उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा ‘हरिवंश राय बच्चन युवा गीतकार सम्मान’ प्रदान किया गया। लोगों ने भी इस संग्रह के गीतों-नवगीतों को बहुत सराहा। आपको कैसा लगा?

जवाब- सच पूछिए तो मेरे लिए यह बहुत आश्चर्यजनक था। क्योंकि जब संस्थान ने इन पुरस्कारों के लिए आवेदन मांगा, तो मैंने आवेदन करने के बारे में सोचा भी नहीं था(क्योंकि मुझे पता ही नहीं था)। इस बाबत लखनऊ से वत्सला पांडे दीदी के साथ-साथ कई लोगों के फ़ोन आए और अंततः मैंने आवेदन कर दिया। जिस दिन पुरस्कारों के लिए नामित लोगों की लिस्ट ज़ारी हुई, मैं देख भी नहीं पाई थी। तभी दैनिक अख़बारों के ऑफिस से कॉल्स आईं, तो मुझे पता चला। लेकिन मेरे लिए इससे भी ज़्यादा सुखद ये रहा, कि लोगों को इस संग्रह की कविताएं पसंद आयीं।

सवाल- भारत की प्रथम शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की जीवनी पर आपकी कृति ‘क्रांति-ज्योति’ प्रकाशित हो चुकी है। क्या सोचकर आपने यह खंड-काव्य लिखा?

जवाब- दरअसल हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां हमारे आदर्शवाद और यथार्थवाद में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है। हम विद्या की देवी सरस्वती की आराधना तो करते हैं। लेकिन उस ऐतिहासिक व्यक्तित्व की जीवनी क्या, नाम से भी बहुत मामूली लोग परिचित हैं, जिन्होंने भारत की आम स्त्री के हाथों की लकीर बदल दी। उसमें क़लम और किताबें थमा दी। सावित्रीबाई फुले की जीवनी पढ़कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैं फूट-फूट कर रोयी। और तुरंत मैंने संकल्प लिया कि इनके जीवन पर एक खंड-काव्य ज़रूर लिखूंगी।

सवाल- आगे आपकी कौन-कौन सी कृतियां हैं, जो पाठकों तक पहुंचने वाली हैं? 

जवाब- ‘खड़े होते रहे शब्द’ (समकालीन कविता) और कहानियों का संग्रह ‘द रिस्ट वॉच’ बहुत जल्द ही (लॉक डाउन) के बाद प्रकाशित होकर पाठकों के बीच में होगी।

सवाल- भविष्य में साहित्य को लेकर आप की क्या योजनाएं हैं?

जवाब- अभी बहुत दूर तक ज़्यादा कुछ सोच कर नहीं रखी हूँ। लेकिन ‘गाज़ीपुर जनपद में स्त्री लेखन का इतिहास’ और एक उपन्यास (नाम अभी नहीं बता सकती) अगले साल की मेरी महत्वपूर्ण योजनाएं हैं।

सवाल- आप पेशे से अध्यापिका हैं, गृहणी हैं, माँ हैं, रचनाकार हैं, मंचों पर भी आना-जाना रहता है।  सब कुछ कैसे मैनेज करती हैं? क्या आपके लिखने का कोई विशेष वक़्त होता है? जैसे सुबह, दोपहर, शाम या रात?

जवाब- मैं जब विद्यालय में रहती हूँ, तो केवल अध्यापिका रहती हूं। घर और साहित्य को वहाँ ढो कर नहीं ले जाती। ठीक उसी तरह जब अपने परिवार और बच्ची के साथ रहती हूं, तो उनके साथ अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाती हूँ। यही कारण हैं कि मंचों पर जाना भी सीमित रखती हूँ। ताकि हर चीज़ बैलेंस्ड रहे। चूंकि अभी उच्च शिक्षा में जाने के लिए भी प्रतियोगी परीक्षाएं दे रही हूं। इसलिए कभी कभी थोड़ा मुश्किल सा सब लगता है। लेकिन….’मुश्किलें ग़र नहीं हों दुनिया में, फ़िर भला हो के हम करेंगे क्या।’

लेखन के लिए एक विशेष समय निर्धारित करना एक स्त्री के लिए तो  बिल्कुल ही असंभव है। ख़ास तौर पर तब, जब वह किसी सरकारी सेवा में हो, बच्चे हों, परिवार हो। लेकिन कोई बात नहीं। स्त्री एक नदी की तरह होती है। उसे अपना रास्ता गढ़ना आता है।

सवाल- आपकी पहचान एक बेहद आदर्श और सुसंस्कृत कवयित्री के रूप में है। आपकी आदर्श कौन-कौन सी ऐतिहासिक स्त्रियां रही हैं?

जवाब- पहली बात तो यह है, कि मुझे यह ही नहीं पता कि आदर्श और सुसंस्कृत होने का पैरामीटर क्या है। मैं सिर्फ़ इतना जानती हूं मेरे लिए आदर्श का तात्पर्य केवल यह है कि प्रकृति ने जो मूल्य और मानवीयता मुझे मेरे जन्म के साथ सौंपा है, उसके साथ आजीवन न्याय कर सकूं। उस पर खरी उतर सकूं। क्योंकि सामाजिक मूल्य और आदर्श हमेशा बदलते रहते हैं। एक ज़माने में बिना घूंघट की स्त्री को कुसंस्कृत माना जाता था, लेकिन आज नहीं। उस स्त्री को गाय (श्रेष्ठ) कहा जाता था(है) जो  हर अन्याय पर मुस्कुराकर परिवार और समाज के साथ सामंजस्य बैठा लेने में निपुण हो। मैं ऐसी स्त्री बिल्कुल भी नहीं हूं।

स्त्री-विमर्श और स्त्री का आदर्शवाद दोनों ही विपरीत बातें हैं। लेकिन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मेरी पहली आदर्श मीरा हैं। इसलिए नहीं, कि वे कृष्ण के प्रेम में पद रचती थीं, या एक सन्त कवयित्री थीं। बल्क़ि इसलिए, क्योंकि वह उस समय की चरम पर्दा प्रथा और सामंतवाद को अपने पैरों तले रौंद कर घर के बाहर निकलीं। एक निम्न वर्ण के संत को अपना गुरु माना। तत्कालीन छद्म आदर्शवादी स्त्री की छवि को छिन्न-भिन्न कर एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में स्वयं को स्थापित किया। मणिकर्णिका… यानि लक्ष्मीबाई मेरे लिए केवल इसलिए आदर्श नहीं है, कि उन्होंने अंग्रेजों के ख़िलाफ़ स्वतंत्रता आंदोलन में अपने प्राणों की आहुति दी। बल्क़ि इसलिए हैं, क्योंकि उन्होंने अपने वैधव्य को तत्कालीन संकुचित चोले से (जो आज भी है) निकाल फेंका। परिवार, समाज और इसके लिए भारत के छोटे-छोटे शासकों का विरोध भी सहा  एक तो स्त्री, दूसरे विधवा। भला उसका नेतृत्व जल्दी हमारा भारतीय मानस कैसे स्वीकारता। लेकिन उन्होंने किया। मुझे नहीं लगता कि इतना गौरवशाली वैधव्य किसी भारतीय स्त्री ने जिया है आज तक। सावित्रीबाई फुले मेरे लिए आदर्श केवल इसलिए नहीं हैं, कि वे भारत की पहली प्रशिक्षित शिक्षिका हैं। बल्क़ि इसलिए हैं क्योंकि “गावस्तृण मिवारण्ये प्रार्थयन्ति नवम नवम” ‘(जैसे गाय को रोज़ चराने को चारा चाहिए, वैसे ही पढ़ी-लिखी स्त्री को नया-नया पुरुष चाहिए)’ इतनी घृणित और निम्न मानसिकता के ख़िलाफ़ उन्होंने आवाज़ उठाई। इसके बदले उन पर पर गोबर उछाले गए। गालियां दी गयीं। कंकड़-पत्थर से मारा गया। इतना कुछ सहकर उन्होंने आम स्त्री के लिए शिक्षा के द्वार खोले। बहुत संघर्ष करके स्त्रियों को पुरुषों के बराबर समानता का अधिकार दिलाया। विधवा स्त्रियों की दुर्दशा पशुओं से भी बदतर थी। उनको हक़ दिलाया।

मेरे लिए वह हर स्त्री आदर्श है जिसने अपने समय के आडम्बर और छद्म आदर्शवाद (रूढ़ियों) को तोड़कर एक नए आदर्श के रूप में न केवल स्वयं को स्थापित किया है, बल्क़ि आने वाली पीढ़ी के लिए नए दरवाज़े भी खोले हैं।

सवाल- आपके एटीट्यूड को लेकर कुछ लोग आप को ‘घमंडी’ भी कह देते हैं। इसके विषय में आप क्या कहना चाहेंगी?

जवाब- हा हा हा हा… घमंडी तो मैं बिल्कुल भी नहीं हूँ। हां, स्वभाव की संकोची और थोड़ी मितभाषी ज़रूर हूं। इसलिए लोग मेरे विषय में ऐसी ग़लत राय बना लेते हैं। जो मुझे बेहद क़रीब से जानते हैं, वे अच्छी तरह समझते हैं कि मेरा मन कितना कोमल है।

 सवाल- आपके ज़ेहन पर छाप छोड़ने वाली तीन किताबें या रचनाएँ कौन-कौन सी हैं? 

जवाब- अज्ञेय मेरे सबसे प्रिय रचनाकार हैं। उनकी ‘शेखर : एक जीवनी’ मुझे बहुत पसंद है। केदारनाथ सिंह का कविता-संग्रह ‘बाघ’ मुझे बेहद पसंद है। बाघ को बिंब और केंद्र मानकर उन्होंने मनुष्य और जीवन के भीतर बाहर घटित तमाम घटनाओं और मनोभावों को बहुत बारीक़ी से चित्रित किया है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ मुझे बहुत प्रिय है।

 सवाल- नए रचनाकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

जवाब- नए रचनाकारों में बहुत संभावनाएं और प्रतिभाएं हैं। लेकिन आज की पीढ़ी में धैर्य की काफ़ी कमी है। थोड़ा सा धैर्य बहुत ज़रूरी है। वरना बहुत तेज़ दौड़ने पर अगर पांव फ़िसला और आप गिरे, तो पीछे वाले आपको रौंद कर आगे बढ़ जाएंगे। अगर थोड़ा धैर्य से चलें तो निश्चित तौर पर बहुत आगे जाएंगे। हां,  एक बात और… लिखने के लिए पढ़ना अनिवार्य ही नहीं बल्क़ि सबसे आवश्यक शर्त है। सृष्टि आप को जन्म देने के साथ-साथ स्वयं को रचने की शक्ति भी थमा देती है। तो फ़िर पढ़ते रहिए,लिखते रहिए और स्वयं को रचते रहिए। धन्यवाद।

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