भारत का सेक्युलरिज्म तथा समान नागरिक संहिता का महत्व

सेक्युलरिज्म की बात आज के हालातों में जरूरी है। जब से हम आजाद हुये है तब से ले के आज तक, खास कर 2014 के बाद यह शब्द लगभग रोज चर्चा में है। कुछ लोग बात-बात पर इसकी दुहाई देते है, कुछ लोगों को डर है कि ये खत्म हो रहा है, कुछ लोगों ने तो सेक्युलरिज्म की रक्षा के नाम पर अपनी-अपनी दुकानें खोल रखी है, लेकिन इन कुछ-कुछ लोगों को छोड़ के हमारे यहां बहुत लोग ऐसे है, जिन्हें अब सेक्युलरिज्म से मन ही मन कुढ़न हो रही है, उनको लगता है कि कही न कही यह शब्द हमारे ही देश में हमारी लंका लगा रहा है।

ऐसे में जब हमारे चारों तरफ सेक्युलरिज्म को लेकर चर्चा गर्म है, खास कर माह ए रमजान की शुरूआत के साथ ही कल हिंदूवादी केंद्र सरकार द्वारा लॉकडाउन के मध्य कोरोना की बढ़ती रफ्तार को दरकिनार कर रियायतें देने के फैसले के बाद यह हर्फ हमारी फ़िजा में फिर तैरने लगा है। अतः आज सेक्युलरिज्म पर बात करना जरूरी हो जाता है।

वस्तुतः सेक्युलरिज्म का भारतीय संस्कृति व इतिहास में कोई खास कॉन्सेप्ट नहीं रहा हूं, क्योंकि हमारी सभ्यता अपनी शुरुआत से ही पंथनिरपेक्ष (सेक्युलर) रही है। सनातन धर्म के संरक्षण में ही बौद्ध, जैन, सिख, पारसी आदि पन्थो को यहाँ पोषण मिला है। यहाँ चार्वाक की नास्तिक विचारधारा को भी आश्रय मिला है। हमारी भूमि पर ही विश्व की पहली ऐसी मस्जिद तामीर हुई जो किसी गैर अरब मुमालिक में बनी पहली मस्जिद थी, ताज्जुब इस बात पर होना चाहिए की केरल के शासक ने मात्र इस बात पर मस्जिद बनवाई थी कि यहां आने वाले विदेशी मुस्लिम व्यापरियों के लिये इबादत की जगह नहीं थी। ऐसे में भारत को सहिष्णुता व पंथनिरपेक्षता किसी से सीखने की आवश्यकता नहीं है। 

सेक्युलरिज्म की जरूरत थी यूरोप को, खासकर ग्रेट ब्रिटेन को आधुनिक युग के निर्माण के समय, जब रोम को पुनः मुश्लिमों से छीना गया था, टर्की जब तुर्की हो गया था, तब जब लगभग 100 साल तब इस्लाम के तेजी से हुये फैलाव के बाद यूरोप में पुनः राजनैतिक स्थिरता स्थापित हो रही थी। यूरोप में व्यापार की वजह से दूसरे धार्मिक विश्वासों को मानने वाले काफी लोग आ रहें थें, यूरोप को अब एक नये समाजिक कलेवर की जरूरत थी अतः पुनर्जागरण काल तक यूरोप में अनेक समाजिक बदलाव हुये, सेक्युलरिज्म उस समय एक समाज सुधार आंदोलन के समान चला, जिसका उद्देश्य यूरोप में धार्मिक टकराव रोकना तथा शांति, समरसता व मानवता कायम रखना था। 

आसान शब्दो में सेक्युलर वो होता है जो किसी भी धार्मिक विश्वास को मानने वाला हो लेकिन वो अपने सार्वजनिक जीवन में किस अन्य के धार्मिक विश्वास का अनादर नहीं करता हो। सेक्युलरिज्म वो विचारधारा है जो समान रूप से विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों को संरक्षण देती है। सेक्युलरिज्म किसी एक पंथ या सम्प्रदाय का पक्ष नहीं लेती, सेक्युलर किसी एक पंथ या सम्प्रदाय का पक्षपाती नहीं हो सकता। सेक्युलरिज्म सभी पंथों को समान मानते हुये समान नजर से देखने की बात करता है।

भारत के लिहाज से बात की जाए तो सन 47 के बाद पंडित नेहरू जी ने भारत को सेक्युलर घोषित कर दिया था लेकिन 1952 के आम चुनावों में पंडित जी ने देश में सेक्युलरिज्म का जो भारतीय संस्करण पेश किया वो मूल सेक्युलर भाव से अलग है। सेक्युलरिज्म जहां समानता की बात करता है, सबको समान अधिकार देता है वहीं भारतीय सेक्युलरिज्म विशेष पंथ को विशेष अधिकार देता है। यूरोपीय-अमेरिकन सेक्युलर देशों में ऐसा नहीं है।

1952 में इस विशेष सेक्युलरिज्म की आवश्यकता पंडित जी को यूं ही नहीं पड़ी, नये-नये बने इस देश में रहने वाले भारतीय मुस्लिम जो उस समय भी विश्व की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी में शुमार थे, अपनी तकरीरों में नेहरू व कांग्रेस को हिंदूवादी बताते थे, विक्टिम कार्ड खेलते थे, समर्थन वापस लेने की धमकी देते थे। ऐसे में नेहरू जी के पास इसके अतिरिक्त कोई अन्य आसान मार्ग नहीं था। नेहरू जी ने जो परम्परा चलाई उसने आज सेक्युलरिज्म के नाम पर भारत में ये एक वर्ग को विशेष नागरिक बनाकर रखा है।

मुस्लिम राजनीतिक प्रेशर गुट ने इंदिरा गांधी पर भी प्रेशर रखा, जिसकी परिणीति संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर (पंथनिरपेक्ष) शब्द जोड़ कर हुई। यह 42 वां संविधान संशोधन उस समय 1976 में किया गया जब संसद चलायमान नहीं थी, आपातकाल में देश कष्ट देख रहा था। भारत का संविधान सेक्युलर (पंथनिरपेक्ष) शब्द को परिभाषित नहीं करता है लेकिन यह घोषणा करता है कि भारत एक सेक्युलर राज्य है, अगर ऐसा है तो भारत को किसी विशेष धर्म का संरक्षण क्यों ? सेक्युलर शासन सभी धर्मों को समान मानता है, सबको समान संरक्षण देने की बात करता है, ऐसे में सेक्युलर शासन में किसी पंथ विशेष को अल्पसंख्यक मान कर विशेष सुविधाएं नहीं दी जा सकती। सेक्युलर शासन सभी धर्मों के लिए समान कानून की सत्ता रखता है, ऐसे में फिर किसी को विशेष छूट या लाभ की आवश्यकता ही नहीं होती। यूरोप के प्रमुख देशों में ऐसा ही है। वहां सत्ता व कानून का नजरिया बहुसंख्यक ईसाइयों व अल्पसंख्यक हिंदुओं, मुश्लिमों आदि के लिये समान है।

सेक्युलरिज्म के नाम पर भारत में हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को नष्ट किया गया लेकिन मुस्लिम समुदाय को अपने पर्सनल लॉ से चलने की सुविधा व संरक्षण दिया गया। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए, एक सेक्युलर देश के नाते भारत की सत्ता किसी विशेष धर्म को संरक्षण नहीं दे सकती। अगर हिंदुओं की धार्मिक परम्पराओं, अधिकारों आदि को कानून की सत्ता के अंतर्गत लाया गया तो यही कानून की सत्ता अन्य धर्मों को मानने वालों पर लागू होनी चाहिये। सेक्युलरिज्म सबको समान नजरों से देखने की बात करता है, धार्मिक आधार पर विभाजन नहीं करना ही सेक्युलरिज्म का मूल तत्व है। इतिहासकार Ronald Inden ने अपनी किताब Imagining India में लिखा है कि भारत ने एक तरफ Secularism अपना लिया और वहीं दूसरी तरफ Muslim Personal Law को भी जारी रखा।  यहां आरक्षण भी है। उनका मानना है कि अगर भारत में धर्म के आधार पर कानून है तो फिर राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष कैसे हो सकता है।

फ्रांस एक सेक्युलर देश का आदर्श उदाहरण है। दुनिया में आधुनिक लोकतंत्र French Revolution के बाद ही शुरू हुआ था। फ्रांस में सरकार ना तो किसी विशेष धर्म के लोगों को कोई सुविधा देती है और ना ही इस आधार पर भेदभाव करती है। ये सिद्धांत फ्रांस में 18वीं शताब्दी से चलता आ रहा है, इसी क्रम में 1905 में फ्रांस ने Law Of Separation के माध्यम से चर्च और सरकार को पूरी तरीके से अलग कर दिया गया था, अर्थात धार्मिक मामलों में सरकार का हस्तक्षेप खत्म कर दिया व सत्ता से जुड़े मामलों में धर्म का। धर्म और सरकार को अलग रखने से फ्रांस का लोकतंत्र कमजोर नहीं हुआ बल्कि और मजबूत हुआ। लेकिन भारत कि स्थिति अलग है। यहां की राजनीति व सत्ता आरक्षण, Minority और मुस्लिम पर्सनल लॉ को बरकरार रखना चाहती है तथा भारत को सेक्युलर राष्ट्र के रूप में देखना चाहती है, जो भारत में सेक्युलरिज्म के नाम पर विशेष वर्ग की तुष्टि करने का मूल कारण है व सेक्युलरिज्म का एक विकृत रूप है।

मेरे अनुसार हमारा संविधान स्वभाव से ही सेक्युलर है। बस उसका वास्तविक अर्थों में पालन आवश्यक था।  सेक्युलरिज्म कहता है कि सभी नागरिक सत्ता की नजर में समान होने चाहिए, संविधान का 14 वां अनुच्छेद यही कहता है, अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, नस्ल, लिंग व जन्म स्थल के नाम और किसी भी तरह का भेदभाव करने पर रोक लगाता है। अनुच्छेद 16 सभी नागरिकों को सेवा के क्षेत्र में समान अवसर देने की बात करता है। अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अपने धार्मिक विश्वास और सिद्धांतों का प्रसार करने या फैलाने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं की स्थापना का अधिकार देता है। अनुच्छेद 27 कहता है कि नागरिकों को किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संस्था की स्थापना या पोषण के एवज में कर देने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 28 कहता है कि राज्य की आर्थिक सहायता द्वारा चलाए जा रहे शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा नही दी जा सकती। ये सभी अनुच्छेद स्वयं सेक्युलरिज्म के प्रत्येक सिद्धान्त को समाहित किये हुये है। हमारे संविधान की प्रस्तावना भारत को पंथनिरपेक्ष घोषित करते हुये यह स्पष्ट करती है की भारत सभी धर्मों के प्रति तटस्थ रहेगा, निष्पक्ष रहेगा, किसी विशेष धर्म का समर्थन नहीं करेगा।

लेकिन फिर भी भारत विशेष धर्म का समर्थन अपने अन्य नियमों से करता है, अल्पसंख्यक आदि के नाम पर विशेष सुविधाएँ देता है। जो कि गलत है, जब तक हमारा संविधान घोषित रूप में सेक्युलर नहीं था, तब तक इसे कुछ हद तक सही माना जा सकता था लेकिन जब आप स्वयं को सेक्युलर घोषित करतें है तो आप किसी को अल्पसंख्यक कैसे मान सकतें हैं ? आप किसी विशेष धर्म को विशेष लाभ कैसे दे सकतें हैं ?

यह सब गड़बड़झाला हमारे यहां सेक्युलरिज्म के नाम पर आजतक चलता आ रहा है, इसका प्रमुख कारण राजनीति और वोट बैंक है। हमारे राजनीतिक दल एक विषय वर्ग को नाराज नहीं करना चाहते, अतः अपने अस्तित्व के लिये सेक्युलरिज्म के नाम पर लगातार तुष्टीकरण करते रहें हैं। वर्तमान मोदी सरकार भी इसी का शिकार है, वो कई दशकों से चली आ रही रवायत को एक झटके में नहीं तोड़ सकती, वो भी तब जब इसे घोषित रूप से मुस्लिम विरोधी कहा जाता हो। ऐसे में समय लगेगा, शायद एक कार्यकाल और। 

सेक्युलरिज्म के नाम पर भारत में चल रहे इस तुष्टिकरण के खेल को रोकने की व्यवस्था हमारे संविधान में है, जिसे समान नागरिक संहिता के नाम से जाना जाता है, जो इसी सेक्युलरिज्म के कारण अभी तक लागू नहीं हो सकी है। लेकिन जब देश संवैधानिक रूप से सेक्युलर घोषित है तो इसे भी अब इम्पोज करना चाहिए, तभी असली सेक्युलर भारत का निर्माण हो पायेगा, जिसमें सभी नागरिक एक होंगे, भारतीय होंगे तथा इन सबके लिये मात्र एक कानून होगा भारत का संविधान।

समान नागरिक संहिता का लक्ष्य व्यक्तिगत कानूनों अर्थात धार्मिक ग्रंथों और रीति-रिवाजों पर आधारित कानून को प्रतिस्थापित करना है। इन कानूनों को सार्वजनिक कानून के नाम से जाना जाता है और इसके अंतर्गत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और संरक्षण जैसे विषयों से संबंधित कानूनों को शामिल किया गया है। बाबा साहेब अंबेडकर का मानना था कि समान नागरिक संहिता को अपनाकर ही समाज में वास्तविक सुधार लाया जा सकता है। अतः संविधान के भाग 4 (राज्य के नीति निदेशक तत्त्व) के तहत अनुच्छेद 44 के अनुसार भारत के समस्त नागरिकों के लिये एक समान नागरिक संहिता का प्रावधान किया गया। इसका व्यावहारिक अर्थ है कि, भारत के सभी धर्मों के नागरिकों के लिये एक समान धर्मनिरपेक्ष कानून होना चाहिये। लेकिन अभी तक भारत में गोवा को छोड़ कर किसी अन्य राज्य में यह कानून लागू नहीं है। न्यायालय भी इसे लागू करने के लिये आदेशित नहीं कर सकती। मात्र सुझाव दे सकती है।

सेक्युलरिज्म का जो ढांचा देश की आजादी के बाद शुरुआती 25 सालों में खड़ा किया गया, जिंसमें बहुसंख्यको के लिए हिन्दू कोड बिल लाया गया और मुश्लिमों के पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप नहीं किया गया, विकृत सेक्यूलरिज्म था। शुरुआती सरकारों ने लगातार इस ढांचे को मजबूत किया, जिसकी वजह से आज के समय में अति आवश्यक होते हुये भी समान नागरिक संहिता को लागू करने की इच्छाशक्ति मोदी सरकार भी नहीं दिखा रही है, जबकि इन्हें अच्छे से पता है कि देश की अधिकांश समस्याओं का समाधान इससे तुरन्त हो सकता है, लेकिन वही बात भारत के कथित सेक्युलरिज्म का फेब्रिक इसे लागू करने से फट जायेगा, जिसका डर सरकार के कदम रोक लेता है। सरकार का डर भी जायज है, इसके विरोध में जितनी संगठित आवाजें सुनाई देती है उतनी ही संगठित आवाजें अगर इसके पक्ष में हो तो शायद सरकार इस ओर कदम बढ़ाये।

समान नागरिक संहिता के लिये न्यायालय ने समय-समय पर सरकार को निर्देशित किया है, लेकिन फिर वही, राजनिति और वोट बैंक इसे रोक लेता है। शाह बानो केस, सरला मुद्गल केस,जॉन वल्लामेट्टम बनाम भारत संघ केस आदि में सुप्रीम कोर्ट ने इसे लागू करने के लिये सुझाव दिये, लेकिन सरकारों की इच्छाशक्ति नहीं होने के कारण ऐसा नहीं हुआ। 

समान नागरिक संहिता की भारत में अभी आवश्यकता है, इसके अनेक लाभ हैं। इसके लागू होने से सभी नागरिकों को बराबरी का दर्जा मिलेगा, धर्म के नाम पर चल रहे तुष्टिकरण पर रोक लगेगी। सभी के लिये एक समान नागरिक, आपराधिक तथा व्यक्तिगत कानून होंगे, सभी को कानून का समान संरक्षण मिलेगा, लैंगिक समानता की बहाली होगी, युवा देश की नव आकांक्षों की पूर्ति के लिए सभी युवाओं के पास समान मौके होंगे। किसी विशेष समुदाय को रियायतें देने या अन्य विशेषाधिकारों के मुद्दों पर राजनीति की कोई संभावना नहीं होगी, जिससे देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण रहेगी।

मेरा मानना है कि नागरिक के अधिकारों की रक्षा के लिए समान नागरिक संहिता एक आदर्श उपाय है, बदलती परिस्थितियों के मध्य अब समय आ गया है कि सभी नागरिकों के  मौलिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए धर्म विशेष के दबाव की परवाह किए बगैर समान नागरिक संहिता को लागू की जाये। समान नागरिक संहिता द्वारा ही पंथनिरपेक्षता ( Secularism ) और राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया जा सकता है। 

लेखक – मकरध्वज तिवारी

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