राजस्थान राजनीतिक संकट – खोदा पहाड़ निकली चुहिया

राजस्थान में गहलोत और पायलट के बीच लगभग दो माह तक चले आंतरिक गतिरोध का अंततः पटाक्षेप हो गया. इस लेख में हम इसपे चर्चा करेंगे

राजस्थान राजनीतिक संकट, मिडिया का बनाया हव्वा, कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई, भाजपा पर गहलोत के वार अंत में सब कुछ ठीक है यार.

लगभग 1 माह पहले राजस्थान में मप्र जैसी राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति सचिन पायलट और उनकी टीम के 18 विधायकों के रूठ कर गुरुग्राम, दिल्ली आने के बाद प्रारंभ हुई. जिसके बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तथा उनकी टीम पायलट खेमे पर आक्रामक रही. गहलोत ने खुद मिडिया के सामने आ कर पायलट को खरी-खोटी सुनाई. PCC अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री के पद से उनकी छुट्टी तक कर दी. सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट तक गहलोत इस राजनीतिक लड़ाई को ले गये. गहलोत समेत पूरी कांग्रेस भाजपा पर इस घटनाक्रम के लिए लगातार हावी रही. जनता सरकार को लेकर असमंजस की स्थिति में रही. लेकिन अब सब कुछ सुधर गया, प्रियंका वाड्रा और राहुल गाँधी के हस्तक्षेप के बाद सचिन पायलट खेमा समझौते को तैयार हुआ. जिसके बाद इस राजनीतिक ड्रामे का पटाक्षेप हुआ. 

ऐसा पोलिटिकल ड्रामा भारत की राजनीति में कम ही देखा गया है. इसके पटाक्षेप के बाद आज मिडिया व जनता के अलग-अलग वर्ग में चर्चा चल रही है कि किसको क्या मिला ? इस लेख में मैं आप से इन्हीं विषयों पर चर्चा करूँगा. 

इस पुरे घटनाक्रम पर शुरुआत व अंत को देखा जाये तो फौरी तौर पर यह कहा जा सकता है कि इससे पायलट की पावर बढ़ी है और गहलोत का कद घटा है. जो की काफी हद तक सही भी है. लेकिन इसका परीक्षण करने के लिए हमें घटनाक्रम के सभी पक्षों को देखना होगा. जिस तरह पायलट व उनके ग्रुप ने दिल्ली तथा गुरूग्राम पलायन किया, उसके बाद गहलोत तथा उनके गुट ने पायलट व उनके ग्रुप के साथ राजनीतिक संस्कारों के अनुसार देखा जाए तो अपमान जनक व्यवहार किया, उससे यह घटनाक्रम किसी बड़े विप्लव का संकेत कई राजनीतिक पंडितों को लग रहा था. 

जिस तरह गहलोत स्वयं भाजपा पर हमलावर थे तथा अदालती कार्यवाही कांग्रेस के दोनों पक्षों की ओर से चल रही थी उससे लग भी रहा था की कुछ बड़ा हो सकता है. कोरोनाकाल के समय भी इस घटना ने देश की राजनीति को गर्म कर के रखा था. ऐसे में कई मित्रों ने मुझसे इस विषय पर राय पूछी, लेकिन इस घटनाक्रम की बढ़ती हुई लम्बाई, अचानक वसुंधरा जी व गहलोत के राजनितिक फलक पर आने, जैसलमेर में कथित रूप से वसुंधरा जी के समर्थक के होटल में गहलोत समर्थक नेताओं की बाड़े बंदी के बाद मैं इस घटनाक्रम के अंत को कुछ-कुछ भांप गया था. अतः अब इस लेख के माध्यम से इस मुद्दे पर आप सभी से बात कर रहा हूँ. 

सचिन पायलट व अशोक गहलोत के बीच दूरी की खबरे काफी समय से आ रही थी, इस विरोध का दूसरा प्रमुख चेहरा रहे विश्वेन्द्र सिंह भी खुल कर कई बार गहलोत का विरोध कर चुके हैं. दोनों प्रमुख नेताओं ने इस मुद्दे पर कई बार आलाकमान से चर्चा करनी चाही लेकिन मनचाही बात कहने का अवसर नहीं मिल रहा था, ऐसे में पायलट खेमे के द्वारा विरोध की आशंका राजस्थान की राजनीती पर नजदीकी से नजर रखने वाले हर व्यक्ति को थी.

जिस तरह से  इस घटना की शुरुआत हुई, राज्य में पहले माहौल बना की सत्ता पक्ष के दल में फूट पड़ने वाली है, मुख्यमंत्री ने तुरंत विशेष जाँच बैठाई, उपमुख्यमंत्री व उनके समर्थको को राजद्रोह व भ्रष्टाचार जैसे मामलों में सम्मन भेजा गया, इतना सब होने के बाद भी आलाकमान द्वारा पायलट ग्रुप को समय नहीं दिया गया, अशोक गहलोत ने पायलट पर अनर्गल आरोप लगाये, उनके प्रति असंसदीय भाषा का प्रयोग किया, पायलट व उनके प्रमुख समर्थकों को पदों से हटा दिया गया, नये PCC अध्यक्ष की नियुक्ति तक कर दी गई, दोनों पक्ष अदालत तक चले गये ऐसे में सबको लग रहा था की कुछ बड़ा होगा. 

लेकिन जैसे ही इस मामले में भाजपा की तरफ से गजेन्द्र सिंह शेखावत का नाम प्रमुखता से आता है तथा AICC में अहमद पटेल, जतिन प्रसाद, KC वेणुगोपाल जैसे पुराने कांग्रेसी एक्टिव होते हैं. राज्य व दिल्ली दोनों जगह, दोनों दलों में गतिविधियाँ बदलने लगती है. प्रदेश भाजपा पर नजर रखने वाला हर व्यक्ति यह जानता है की वसुंधरा जी भाजपा में किसी अन्य को अपने कद तक आने नहीं देती, गजेन्द्र सिंह शेखावत की इनकी कोल्ड वार भी चौड़े में हैं. ऐसे में वसुंधरा जी ने गहलोत जी के साथ अपने अघोषित गठबंधन को निभाया. वसुंधरा द्वारा राज्य में कांग्रेस सरकार गिराने के लिए आलाकमान को मना करना, 45 विधायकों का वसुंधरा के साथ इस निर्णय में होना, जैसलमेर के जिस होटल में गहलोत गुट के विधायकों को रखा गया उसके मालिक का वसुंधरा जी से सम्बन्ध होना, इस बात को प्रत्यक्ष करता है की वसुंधरा जी ने अशोक जी को उनकी सरकार बचाने में अप्रत्यक्ष मदद की तथा प्रदेश भाजपा में अपने कद को पुनः सभी को दिखाया. 

जो लोग इस घटनाक्रम को मप्र से जोड़ कर देख रहे हैं वो ये नहीं देख रहें है की मप्र में भाजपा जिस तुलना में सक्रीय थी उसका दशांश भी राजस्थान में देखने को नहीं मिला. राजस्थान में भाजपा मौके का लाभ उठाने की ताक में अवश्य थी, इसे नकारा नहीं जा सकता, राजनीति में यह स्वभाविक भी हैं. यहाँ पर गहलोत जी ने जिस तरह से घटना को शुरू में हेंडल किया व पायलट ने जिस तरह इनको कोई जवाब नहीं देते हुए पार्टी से अपना साथ बनाये रखा, पायलट के समर्थक भी उतने ही उग्र दिखे जितने में पार्टी का सम्मान बरकरार रख सकें, ऐसे में एक समय के बाद यह लगने लग गया था की यह विरोध पायलट का शक्ति प्रदर्शन है, और कुछ नहीं.

प्रियंका वाड्रा व राहुल गाँधी से मुलाकात के बाद पायलट व उनके समर्थकों की भाव-भंगिमा तथा गहलोत व उनके गुट के लोगों की भाव-भंगिमा यह साबित कर रही है की अपने इस लम्बे प्रतिरोध के बाद पायलट कितने सफल रहें हैं. गहलोत जी की छवि को आलाकमान के सामने कमजोर करने में भी पायलट व उनका खेमा इस घटनाक्रम के बाद सफल रहा है. सूत्रों के अनुसार पायलट पुनः दोनों पदों पर वापस आये गे, उनके गुट में से किसी एक को उपमुख्यमंत्री बनाया जायेगा, गहलोत जी को अब उनसे मिल कर काम करना होगा तथा अगले मुख्यमंत्री के रूप में पायलट के नाम की घोषणा हो सकती है. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा की इस घटना के बाद गहलोत का कद घटा है व पायलट की पावर बढ़ी है. 

इस घटनाक्रम के बाद पायलट में अपनी ताकत का अहसास भी आलाकमान को करवाया है, उनके साथ गए विश्वेन्द्र सिंह आदि अन्य विधायक प्रदेश में पार्टी के अतिरिक्त अपना पारिवारिक व व्यक्तिगत प्रभाव भी रखते थें, पायलट की नाराजगी से कांग्रेस को मात्र राजस्थान में नुकसान नहीं था. गुर्जर समाज के देश का एक मात्र राष्ट्रीय नेता होने व युवाओं में लोकप्रिय होने के कारण पायलट का प्रभाव मप्र, हरियाणा, उप्र, गुजरात आदि राज्यों में गुर्जर बहुल क्षेत्रों पर भी पड़ता. कांग्रेस के कई गुर्जर विधायक को गहलोत के साथ थे व कांग्रेस के कई गुर्जर नेताओं पर समाज का दबाव था की वो पायलट का समर्थन करें. जतिन प्रसाद, उमर अब्दुला, दीपेन्द्र हुड्डा आदि कई नेता पायलट की पैरवी कर रहे थें, ऐसे में पायलट के पास अच्छा ख़ासा बैकअप था. गहलोत के बयान भी मिडिया व जनता के बीच पायलट के पक्ष में काम कर रहे थें. ऐसे में पायलट गहलोत पर लाजिम रूप से भारी पड़े. यही मुख्य कारण रहा की आलाकमान को सिंधिया के उलट पायलट को रोकने के लिए सक्रीय होना पड़ा.

इस घटना ने एक बार पुनः अप्रत्यक्ष रूप से प्रियंका वाड्रा व राहुल गाँधी को कांग्रेस के फलक पर हाईलाइट करने का कार्य भी किया है. पायलट के इस प्रतिरोध में दोनों भाई-बहनों की जो अंतिम निर्णायक भूमिका सामने आई है, उसने मिडिया के एक वर्ग को राहुल गाँधी को पुनः लांच करने का मौका दिया है, जिसे में पायलट की तरफ से राहुल गाँधी को दिया बोनस गिफ्ट मानता हूँ.

इस घटनाक्रम ने AICC को अपने युवा नेताओं के प्रति सोचने के प्रति भी विवश कर दिया है, जो की अच्छा है. इस घटना के बाद अगर कांग्रेस हर राज्य में अपनी अगली पीढ़ी के नेताओं के विभिन्न कंसर्नस पर स्वतः संज्ञान ले कर काम करे तो कांग्रेस काफी हद तक मजबूत हो सकती है. वरिष्ठ नेताओं की महत्वाकांक्षा के सामने युवाओं की आकांक्षा को भी अब कांग्रेस का आलाकमान  सुनेगा, इसकी उम्मीद अब इस घटना के बाद की जा सकती है. क्योंकि युवा आकांक्षाओं को नकारने के कारण ही मप्र में कांग्रेस की सरकार गई और राजस्थान का नाटक देश को देखने को मिला. अगर ऐसा ही चलता रहा तो कांग्रेस हर बार भाजपा पर आरोप लगा कर नहीं बच सकती. 

अब इस घटना के पटाक्षेप के बाद प्रदेश की जनता कांग्रेस से उम्मीद करेगी गहलोत तथा पायलट मिल कर प्रदेश के हित में काम करेंगे. अब सरकार अपने वचन पत्र के अनुकूल कोरोनाकाल में प्रदेश को संभालते हुए जनोपयोगी कार्यों पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी तथा शासन व दलगत राजनीति के लिए देश में आदर्श के रूप में उभरेगी. 

जिस तरह से इतना हाईप बनने के बाद इस घटनाक्रम का पटाक्षेप हुआ है, ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ वाली कहावत याद आ गई. आगे से देश अब ऐसे राजनीतिक नाटकों को लेकर कम सिरियस होगा. अगर ऐसे ही नेता अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा में सत्य को हराते जीताते रहें तो राजनीति को एक दिन हेय दृष्टि से देखा जाने लगेगा. अतं में मैं भाजपा व कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों से यह निवेदन करना चाहूँगा की भारतीय राजनीति में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो उसका उपाय करें. राजनीति शुचिता व सेवा का दूसरा नाम है. किसी राज्य में अचानक सरकार बदलना अथवा ऐसी राजनितिक अस्थिरता की स्थिति उस राज्य की जनता को प्रताड़ित करती है. जिसका ध्यान रखना सभी राजनीतिक दलों का कर्तव्य हैं.

मकरध्वज तिवारी 

( राजनितिक विश्लेषक, लेखक )

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