ल़ॉकडाउन में फंसे लोगों की मदद जरूरी -शंभू शिखर


कोरोना से निपटने के लिए आपस के तमाम मतभेदों को भुलाकर पूरा देश एकजुट हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर 21 दिनों के लॉकडाउन को सफल बनाने के लिए लोग पूरी तरह तत्पर हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच कोरोना से जंग को लेकर कोई तकरार नहीं है। लॉकडाउन जरूरी कदम है इसपर सभी सहमत हैं। एक दूसरे के प्रति सहयोग की भावना आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है। उद्योगपतियों से लेकर सामाजिक संस्थाओं तक। जन प्रतिनिधियों से लेकर नौकरशाह तक जिससे जो बन रहा है कर रहा है। मुहल्ला और क़ॉलोनी स्तर पर लोग इस बात का ध्यान रख रहे हैं कि उसके पड़ोस में कोई भूखा तो नहीं है। किसी को कोई परेशानी तो नहीं है। आम दिनों मे कोई इन बातों की चिंता नहीं करता है। उस समय लोग पूरी तरह आत्मकेंद्रीत रहते हैं। उनका अपना मैं जागृत रहता है। लेकिन भारत की यह खूबसूरती है किसी आपदा के पेश आने पर हर भारतीय का मैं तुरंत हम में बदल जाता है। पूरा देश भावनात्मक रूप से एक परिवार में बदल जाता है। आत्मकेंद्रीयता की जगह सामूहिकता का संचार होने लगता है। व्यक्ति और समाज के बीच की विभाजन रेखा मिट जाती है। आजादी के बाद युद्धकाल में अथवा हर आपदा के मौके पर यह देखा गया है। कोरोना से युद्ध के दौरान भी यही देखा जा रहा है। यह अच्छी बात है। लेकिन कोरोना के खिलाफ जंग के क्रम में लॉकडाउन के कारण कुछ समस्याएं भी उत्पन्न हुई हैं जिनका निराकरण करना तत्काल जरूरी है।
अभी करीब पांच करोड़ दिहाड़ी मजदूर देश के विभिन्न राजमार्गों पर पैदल चले जा रहे हैं। वे भूखे. प्यासे 100-150 किलोमीटर की दूरी तय भी कर चुके हैं। कम पढ़े लिखें और जागरुकता के अभाव के कारण वे प्रशासन के समक्ष अपनी समस्या नहीं रख सके। लॉकडाउन के कारण उनके पास कोई काम नहीं था। बाद में भी काम मिलने की कोई गारंटी नहीं थी। सार्वजनिक वाहन बंद हो चुके थे। जेब में पैसे नहीं थे। 21 दिन के लिए राशन नहीं था। ऐसे में गांव वापस लौट जाना ही बेहतर था। उन्होंने न हेल्पलाइन पर संपर्क किया न पुलिस-प्रशासन को कुछ जानकारी दी। बोरिया बिस्तर उठाया और पैदल ही चल दिए। स्थिति की जानकारी नहीं होने के कारण उन्हें कोई मदद नहीं मिली। रास्ते में पुलिस ने भी परेशान किया। तीन-चार दिन तक उन्हें कुछ खाने को भी नहीं मिला। ग़नीमत है कि कुछ खबरिया चैनलों ने उनकी समस्या को उजागर किया। खबर पाने के बाद सरकार सक्रिय हुई। गृह मंत्रालय ने राज्य सरकारों से संपर्क किया। रास्ते के तमाम थानों को निर्देश दिया गया कि पैदल जाते प्रवासी मजदूरों के भोजन और जरूरी सुविधाओं की पूर्ति करें और राज्य सरकार को कहा कि उन्हें उनके घरों तक पहुंचाने में मदद करें। हाइवे पर ऐसे प्रवासी मजदूरों के भोजन और विश्राम की व्यवस्था की गई। कई मजदूरों को तीन-चार दिन भूखे रहने के बाद भोजन मिला। सरकार और समाज ने संवेदनशीलता दिखाई। ज्यादातर मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पं बंगाल और उड़ीसा के हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश के बाद संबंधित राज्य सरकारों ने इसकी व्यवस्था की है।
हालांकि अभी लॉकडाउन होने के बाद डर और सतर्कता का ऐसा माहौल है कि बाहर से आनेवालों को किसी गांव में प्रवेश की इजाजत नहीं मिल रही है। गांववाले न खुद गांव के बाहर जा रहे हैं न किसी को अंदर आने दे रहे हैं। चाहे वह उनका रिश्तेदार ही क्यों न हो। ऐसे में इन मजदूरों को गांव पहुंचने के बाद भी अपने घर तक पहुंचने में कठिनाई हो सकती है। कोरोना संक्रमित होने के शक में उनके साथ दुर्व्यवहार भी हो सकता है। उनके लिए बेहतर यही होगा कि वे जहां तक पहुंच चुके हैं वहीं उनको 15 अप्रैल तक रोके रखने की व्यवस्था की जाए। वे जहां भी होंगे आसपास कोई स्कूल होगा जो बंद पड़ा होगा। वहां उनकी व्यवस्था की जा सकती है। उनके लिए आगे जाना भी मुश्किल है और पीछे लौटना भी। ल़ॉकडाउन को सफल बनाने और कोरोना को परास्त करने के लिए यह जरूरी है कि जो जहां है वहीं पर पड़ा रहे।
इधर ट्रक ओनर ऐसोसिएशनों का दावा है कि 50 लाख से अधिक ट्रक राष्ट्रीय उच्चमार्गों पर फंसे हुए हैं। उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी जा रही है। ट्रक ड्राइवर और खलासी परेशान हैं। उनके पास लॉकडाउन की अवधि तक के लिए न राशन है न पैसे। ट्रकों का परिचालन नहीं होने के कारण आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी बाधित है। सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप्प हो जाएगी तो कोरोना के खिलाफ लड़ना मुश्किल हो जाएगा। व्यापारियों को कालाबाजारी और जमाखोरी का मौका मिल जाएगा। उपभोक्ता परेशान हो जाएंगे। एक ड्राइवर का कहना था कि कोरोना से तो बच जाएंगे लेकिन भूख से नहीं बच पाएंगे। आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई किसी कीमत पर नहीं रोकना चाहिए और जो ट्रक ड्राइवर, खलासी फंसे पड़े हैं उन्हें या तो परिचालन की छूट देनी चाहिए या घरों तक जाने की इजाजत देनी चाहिए। आपदा के समय इस तरह की स्थितियां आती हैं लेकिन सरकार को चाहिए कि उनकी जानकारी मिलने पर तत्काल निवारण करते जाया जाए।
अभी तो यह कोरोना के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत है। उसे परास्त करने में कितना समय लगेगा कोई नहीं बता सकता। अमेरिका, ईरान, इटली जैसे देशों में यह मौत का तांडव मचा रहा है। भारत में अभी संक्रमित लोगो की संख्या चार अंकों तक भी नहीं पहुंची है। मृत्यु भी 20 लोगों की ही हुई है। ऐसे में कोरोना की जंग 21 दिनों के लॉकडाउन मे जीत ली जाएगी या इसे और बढ़ाना पड़ेगा कौन जानता है। फिलहाल सरकार हो या समाज बेहद सतर्क रहना और आपस में समन्वय बनाए रखना जरूरी है।

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