नेपाल : संविधान दिवस पर पहाड़ों में जश्न मैदानों में विरोध

  • मधेशी समुदाय के कई दलों व संगठनों ने कहा काला दिवस है संविधान दिवस

धर्मेंद्र चौधरी

पड़ोसी राष्ट्र नेपाल 20 सितंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाएगा। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली शर्मा ने ट्वीट कर सभी नेपाल वासियों को संविधान दिवस की बधाई दी है। लेकिन 20 सितंबर 2015 को लागू हुए नेपाली संविधान का मैदानी मधेशी बाहुल्य इलाकों में शुरू से ही विरोध है। नेपाल संविधान में मधेशी क्षेत्र वासियों के लिए नागरिकता व उच्च पदेन नौकरियों के लिए काफी पाबंदी है। सबसे बड़ी बात यह कि भारत से ब्याह कर आई बेटियों को नेपाल में सात वर्ष बाद स्थाई नागरिकता मिलने जैसे नियम-कानून को हटाने व संविधान में संशोधन करने का मांग तूल पकड़ रही है। नेपाल के रुपंदेही, नवलपरासी व कपिलवस्तु जिले में कई मधेशी राजनैतिक दलों व संगठनों संविधान के विरोध में तीन दिवसीय विरोध-प्रदर्शन का एलान किया है। साथ ही संविधान दिवस को काला दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया है। लुंबिनी, मर्चवार व भैरहवा क्षेत्र में जनता समाज पार्टी व जनमत पार्टी के पदाधिकारियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया। जनमत पार्टी के केंद्रीय सदस्य भूपेंद्र यादव का कहना है कि नेपाल का संविधान भेदभाव पूर्ण है। संविधान में मधेशी व आदिवासी समुदाय के साथ भेदभाव किया गया है।
वही, दूसरी तरफ नेपाल के पोखरा, पाल्पा, बाग्लुंग, मुग्लिंग व राजधानी काठमांडू के पहाड़ी इलाकों में कम्युनिस्ट राजनैतिक दल संविधान दिवस को धूमधाम से मना रहे हैं।
बतादें कि वर्ष 2014-15 में संविधान का मसौदा देखकर मधेशी आंदोलनरत हुए। करीब दो वर्ष तक प्रदर्शन हुए। पहाड़ी बनाम मधेशी समुदाय में हिंसक टकराव हुए। लेकिन इस विरोध के बाद भी संविधान में कोई संशोधन नहीं हुआ। उसके बाद हुए आम चुनावों में कम्युनिस्ट दल को जीत मिली। एमाले दल के केपी ओली शर्मा प्रधानमंत्री बने। लेकिन मधेशी क्षेत्र में सत्ता के लोभ की राजनीति उजागर हो गई। मदेशी अधिकारों के हक के लिए आंदोलन करने वाले कई दल व नेताओं ने कम्युनिस्ट दलों से गठबंधन कर लिया या फिर कम्युनिस्ट दलों में शामिल हो गए। जिसकी बड़ी बानगी उपेंद्र यादव रहे। जो मधेश आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा रहे। लेकिन सत्ता से कुछ बिंदुओं पर समझौता कर वह उप प्रधानमंत्री बन गए। मधेशी के नाम पर इस मौका परस्त राजनीति से मधेश समुदाय एक विश्वासी संगठन की बाट जोह रहा है। संविधान विरोध व समर्थन के नाम भी नेपाल की घरेलू सियासत काफी गर्म है।

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