ग़ज़ल

वतन की चूमकर मिट्टी तिलक माथे लगाए हैं।

लगाकर जान की बाजी तिरंगे को सजाए हैं।।

अमानत है यही अशफ़ाक़ शेखर मंगलपांडे की।

लहू से सींचकर धरती वतन अपना बचाए हैं।।

बनाकर घास की रोटी कभी राणा ने खायी थी।

न पूछो जंगलों में दिन यहाँ कैसे बिताए हैं।।

जले हैं धूप में, सर्दी में कांपे, मेघ में भीगे।

हमारे अन्नदाता अन्न तब जाकर उगाए हैं।।

उठीं दुश्मन की नज़रें जब कभी भी भारती माँ पर।

हमारे सैनिकों से वो हमेशा मुहकी खाए हैं।।

न भूले हैं, न भूलेंगे, कभी उनकी शहादत को।

जुबां पे भारती माँ दिल में हिन्दुस्ताँ बसाए हैं।।

© प्रतिभा गुप्ता ‘प्रबोधिनी

खजनी, गोरखपुर।

Keshav Shukla

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