करोना – प्रोः वीना कुमारी

करोना
ग़र कहीं करोना मिल जाए, उसे पीटूं भी और प्यार करूं ,
देखूं मैं उसको जी भर कर और उसका मैं दीदार करूं ।
तूने ये क्या सितम ढाया है, सारी दुनिया को दबकाया है ,
जो फिरते देश विदेश में थे ,उन्हे अर्श से फर्श पर लाया है ।
काई आलिंगन ना कर सकता, कोई हाथ भी न मिला सकता ,
ग़र मर जाए कोई तेरे हाथों ,उसे मुखाग्नि भी न दिखा सकता ।
तेरे डर ने बहुतों को सताया है,बहुतों ने काम गवाया है ,
कई भटकते फिरते सड़कों पर,कईयों को पानी भी न मिल पाया है !
देख कर लोगों के दुखड़े मन व्यथित सा हो आया है !!!
पर पलट कर जो मैं देखूं, मुझे हर शै अनोखी लगे ,
अब पंछी अम्बर में उड़ते हैं,और मोर भी नाच दिखाते हैं ,
कादर की कुदरत के ज़र्रे, रोशन हो हो कर जाते हैं !
गंगा का जल निर्मल हुआ, सतलुज भी साफ़ साफ़ हुई ,
अब अक्स भी साफ़ साफ़ दिखे, किसी सपने सी प्रभात हुई !
अब नील गगन नीला नीला,और तारे भी चमकीले हैं ,
जब मैं निहारूं इन को, ये लगते बड़े शर्मीले हैं ।
जो सम्भव ना हुआ इस दुनिया से, वो करोना ने कर दिखाया है ,
कभी मैं महसूस करूं, इसने धरती के ज़ख्मों पर अनोखा मलहम लगाया है ।
देखकर ये सब मुझे प्रभु का स्मरण हो आया है !!!
प्रोः वीना कुमारी

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