संघर्ष और स्वावलंबिता की मिशाल रहे विंध्याचल जायसवाल

धर्मेन्द्र चौधरी की कलम से,,,,,(श्रद्धांजलि लेख):

  • वर्ष 1994-95 की बात है। नौतनवा इंटर कालेज का मैदान दर्शकों से भरा था। स्व.शत्रुघ्न सिंह मेमोरियल फुटबॉल प्रतियोगिता चल रही थी। दर्शकों के हो हल्ला के बीच खिलाड़ी विरोधियों को छकाते हुए फुटबॉल को अपने काबू में कर गोल पोस्ट में धकेलने की जद्दोजहद में जूझ रहे थे। मैं भी दर्शक दीर्घा फुटबॉल के रंगमंच में रमने का प्रयास कर रहा था। शोर करके, चिल्लाकर, ताली बजा कर और खिलाड़ियों की हूटिंग करके। मजा आ रहा था। तभी एक सांवला सा व्यक्ति अचानक ही हमारे दौड़ कर हमारे सम्मुख आ गया। रेफरी की ड्रेस व हाथ में झंडा लिए। उसके भौ, चेहरे का हावभाव नाराजगी भरा था। आंखों की गुरेरगी हमारी ही तरफ थी।
    “ए लड़के लोग , लाइन से अंदर आए, फालतू हल्ला कर डिस्टर्ब किए तो डंडे से मारेंगे। समझे न!चलो थोड़ा पीछे हटो।”
    फिर वह सांवला शख्स हाथ मे झंडा लिए लाइन के किनारे उस सीध में दौड़ पड़ा जिस तरफ खिलाड़ियों की झुंड फुटबॉल से जूझ रहा था। गले में फीते से बंधी एक पिपिहिरी (सीटी) भी लटक रही थी। जिसे वह समय-समय पिर्र-पिर्र बजाकर खेल को रोक देता था।
    -हमें डांट कर चला गया। मित्र मंडली ने ठान लिया कि बदला लेना है। उस सांवले शख्श को ‘कलुआ’ कह कर चिढ़ाना है। दर्शकों की भीड़ में छुप कर शुरु हुआ चढ़ाना। चिल्ला कर कलुआ रे,,,,,। पूरी प्रतियोगिता भर यही सिलसिला चला। हम दूर दूर से चिढ़ाते थे। वह रेफरी खूब गुस्साता था, चिढ़ जाता था। लेकिन हम दर्शक दीर्घा में छिप जाते थे। बहुत मजा आता था इस चिढ़ाने वाली लुका छिपी में। कलुआ नामक वह किरदार व उसके साथ कि ठिठोली मनोस्मृति के एक कोने में अंकित हो गई।
    समय बीता,,,करीब बीस वर्ष बाद। मैं दैनिक जागरण नौतनवा में विजय सिंह के साथ था। किसी खबर पर चर्चा चल रही थी। एक शख्श हाथ में चना-भुजा की कागजी पैकेट लेकर प्रवेश किया। जाना पहचाना लग रहा था, देखा था कभी कभार । लीजिए प्रभारी जी भुजा खाइए। विजय सिंह बोले- आइये विंध्याचल भाई,,आप ही तो ख्याल रखते हैं,, भुजा तो लाते हैं। विंध्याचल जी को ध्यान से देखा तो अचानक
    मेरे मनोस्मृति की कुछ यादें ताज़ी हो गई। ,,,वह सांवला रेफरी,,इंटर कालेज का मैदान, फुटबॉल मैच और ,,,कलुआ कह कर चिढ़ाना।
    विंध्याचल जी के करीब आने का मौका मिला।
    धीरे-धीरे बहुत कुछ जाना। उनकी पत्नी काफी समय पहले दुनियां छोड़ चुकी थी। बेटा-बेटी को बहुत प्यार करते थे। उनकी शिक्षा के प्रति बहुत गंभीर रहते थे। बेटा-बेटी दूर शहर पढ़ने को भेजा था। छोटा भाई संजू असमय काल के गाल में समाया तो विंध्याचल को रोते देखा। तब से उनके और करीब आने व समझने का मन किया। और करीब से विंध्याचल जी को पढ़ा। तो वास्तव में वह व्यक्ति संघर्ष व स्वावलंबिता का जीता जागता उदारण था। सम्मान के आगे किसी भी चीज से समझौते की फितरत नहीं थी। जुनूनी, दृढ़निश्चई व एकाकी। भूजा खाकर , होटल में खाना खाकर भी लोगों के बीच ऐसा रहने का जज्बा कि लजीज पकवान खाए हो। मन में क्या है, दिल में क्या है ,,न ही कोई टटोलता था, और न ही विंध्याचल किसी को बताता था। मेरा बेटा-मेरी बेटी। यह शब्द बरबस ही मुख पर आते रहते थे। बेटे की शादी की तो सभी को बुलाया। मुझे भी बुलाया। फोन किया। “टुन्ने जयहिंद में बरात चलेक बा। तोहरे खातिर दारू-चीखना क भी व्यवस्था बा। समय से आ जईहा, समझला। गजब शख्सियत थी। उसकी प्रार्थना भी आदेश के भाव वाली थी। हम घंटों बातें करते थे। मैंने बताया भी था कि कलुआ कर हमीं चिढ़ाते थे। हंस पड़ा बंदा। बोला- हमहूं के याद बा ,,,तू ही लोग चिढ़ावत रहला।

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