ग्लेशियर नहीं सांस की एक डोर टूटी है सिर्फ एक ग्लेशियर नहीं टूटा..पंकज शर्मा

ग्लेशियर नहीं सांस की एक डोर टूटी है सिर्फ एक ग्लेशियर नहीं टूटा, बल्कि मुझे लगता है कि मानवीय अस्तित्व और अंतिम प्रलय के बीच का एक और क़िला इंसान हार गए। क्योंकि एक ग्लेशियर की असमय मौत का शोक निश्चित रूप से किसी न किसी नदी को मनाना ही पड़ता है। और जब नदियों के मन खुष्क होते हैं तो जल, जंगल और ज़मीन से जीवन रस सूखता चला जाता है, सभ्यताओं के हिस्से में तब सवाल आता है कि क्या छोड़कर जाएंगे हम अपनी पीढ़ियों के लिए ?प्रेम, आस्था और खुशियों की तलाश में मैदानों से लोग पहाड़ों पर जाते हैं अच्छी बात है लेकिन जब लौटते समय उनमें से कई शराब की बोतलें, प्लास्टिक के बैग्स और दूसरे तरह का कचरा छोड़कर आते हैं तो वो कमाया हर पुण्य या आनंद गंवा चुके होते हैं। बारिशें उस कचरे को न जाने कहां कहां पहुंचाती हैं, न जाने कहां कहां कचरे की चट्टानें प्राकृतिक निर्माण की व्यवस्था में हस्तक्षेप करती हैं। न जाने कहां कहां वो कचरा वन्य प्राणियों के लिए ज़हर परोसता है। जब वन और जीव ही कुप्रभावित होते हैं तब जीवन पर पड़ने वाले बुरे असर से कौन बचाएगा ?मैं पहाड़ी नहीं लेकिन पहाड़ी मर्यादाओं को समझता हूं, वो मर्यादाएँ मद्धम स्वर में प्राकृतिक सौंदर्य की प्रशंसा या पूजा की अनुमति देती हैं। वो मर्यादाएं एक सीमा तक जाने के बाद पहाड़ी सौंदर्य के प्रति इंसानों को उनकी वर्जनाएं याद दिलाती हैं। वो मर्यादाएं देवभूमि का आदर करना सिखाती हैं। अफसोस वो मर्यादाएं लालच, स्वार्थ और विकास की अंधी दौड़ में रोज़ कुचली जाती हैं। लाखों तरह से। लाखों लोगों के कारण। मैं व्यक्तिगत रूप से मन ही मन उदास हो जाता हूं जब किसी पहाड़ से ररकते हुए किसी कंकर को गिरते देखता हूं, क्योंकि मुझे लगता है कि वो किसी विशाल पहाड़ी के स्खलन की पहली प्रक्रिया है। मुझे पहाड़ बहुत रोमांचित करते हैं। मेरी अंतिम इच्छाओं में से एक ये भी है कि मेरे इस संसार से जाने के बाद जब कोई मेरी कुटिया का दरवाज़ा खोले तो वो कुटिया किसी सुरम्य पहाड़ी पर हो। उस रोज़ बिस्तर से सटी खिड़की से होती हुई सर्दियों की धूप मेरे चेहरे पर खिली हो और हवाएं मेरे सफेद बालों को सहला रही हों। मेरे पास ढेरों किताबें हों, उनमें कुछ मेरी लिखी हुई हों और कुछ मेरे पसंदीदा लोगों की। मेरे पास की मेज़ पर एक पेन खुला हो और मेरी कोई अधूरी लिखी किताब..कोरे पन्ने फड़फड़ा रहे हों।मालूम नहीं मेरी इच्छा पूरी होगी कि नहीं, मालूम नहीं तब तक पहाड़ बचेंगे कि नहीं। मालूम नहीं तब तक दुनिया बचेगी कि नहीं।बस इतनी सी प्रार्थना है सभी से कि पहाड़ों से प्रेम कीजिए उनका दोहन नहीं। पहाड़ों के मातृत्व के बीच पुत्रवत श्रद्धा लेकर जाइए, किसी विजयी सरीखा अहंकार लेकर नहीं। याद रखिए भारत की जीवन रेखा गंगा के उद्गम गोमुख से ग्लेशियर रूठ रहे हैं। याद रखिए इंसानों की लोलुपता और लालसाओं ने समूची मानव सभ्यता को खतरे में डाल दिया है। जब किसी ग्लेशियर का टूटना या सूखना सुनें तो उसमें समय की तरफ से अंतिम चेतावनी ज़रूर सुनें। देर हो चुकी है, जो बचा है उसे बचा लीजिए।

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