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इंसानियत है

अभी अभी जो देखा उसको देख कर विश्वास हो गया इंसानियत बाकी है।
मैं सफर में हूँ, बस के अंदर बैठी बाहर झांक रही थी । सफर में ऐसा करना मेरा पसंदीदा शगल होता है।
सड़क पर काफी भीड़ थी। बस रूकी हुई थी शायद सिग्नल पर है।
रात के नौ बज रहे है, मेरे बगल में एक सब्जी वाला सब्जी बेच कर घर जा रहा होगा। उसके ठेले में कुछ बची कुची सब्जी थी जैसा चार कैरी, तीन चार टमाटर, एक ककड़ी और कुछ पत्ता गोभी के पत्ते रखे थे।
सड़क के किनारे एक मोटी सी स्त्री तंबू के नीचे बैठी थी, अपने चार बच्चों के साथ । तभी उनमें से एक छोटी बच्ची की नजर सब्जी के ठेले पर पड़ी। वो दौड़ कर सब्जी के ठेले के पास आकर खड़ी हो गई और ललचाई नज़रों से बची कुची सब्जी की तरफ देखने लगी।
सब्जी वाले ने उसे अपने उल्टे हाथ से इशारा किया मानो कह रहा हो जल्दी से उठा ले जो चाहिए और छोटी बच्ची ने उसकी जैसे बात समझ ली और झट से मुस्कुराते हुए दो कैरी और एक टमाटर उठा लिया और अपने दोनों हाथों में उठा कर दौड़ कर तंबू की तरफ चली गई। उसको देख कर उसका भाई भी दौड़ता हुआ आया और उसने भी इशारे से सब्जी वाले से पूछ कर सब्जी उठा कर लेने की सहमति ले लो। उस लड़के ने एक कैरी, एक ककड़ी और दो टमाटर उठा लिए और एक पैर ऊंचा और दूसरा पैर हवा में उछालता वो भी तंबू की तरफ दौड़ा। मैने उस सब्जी वाले को जिससे मेरी कैसी भी पहचान नही है को खूब सारी दुआ दी।
बचपन से सुन रही हूँ, नेकी करो ईश्वर सब देख रहा है। आज इस बात का असल मतलब समझ आया। जैसे उस सब्जी वाले को नही पता की मैं उसको देख रही थी । सोचो सोचो आपको, मेरको, कौन कौन, कब कब, कहां कहां देखता होगा …..

मन बंजारा

अब ये मत पूछना आज कहा जा रही हुँ 😁 अरे! जैसा नाम वैसा काम 😁 बंजारे कब कहा टिक कर बैठे है 😁

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